कक्षा :– ५ एकम :– १०. सीखो कवि :- श्रीनाथसिंहजी को अर्पण
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| Poem |
- फूलों से नित हँसना सीखो, भौरों से नित गाना । (2)
- तरु की झुकी डालियों से नित, सीखो शीश झुकाना ।
सीख हवा के झोंको से लो, कोमल भाव बहाना ।
दूध तथा पानी से सीखो, मिलना और मिलाना ।
सूरज
की किरणों से सीखो, जगना और जगाना ।
लता
और पेडों से सीखो, सबको गले लगाना ।
पतझड़ के पेडों से सीखो, दुःख में धीरज धरना ।
दीपक से सीखो जितना हो,
सके अँधेरा हरना ।
पृथ्वी से सीखो प्राणी की,
सच्ची सेवा करना ।
जलधारा से सीखो आगे, जीवनपथ में बढ़ना ।
और धूए से सीखो हरदम, ऊंचे ही पर चढना ।
फूलों से नित हँसना सीखो,
भौरों से नित गाना । (2)
कुत्ता – वफादारी
हंस – नीर-क्षीरवृत्ति
सियार – चतुराई
बुलबुल – मधुर गान
मधुमक्खी – परिश्रम
अगरबत्ती – सुवास फैलाना,
परोपकार
नदी – अविरत गति
चींटी – परिश्रम
मकड़ी – सतत प्रयास

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